अंतर्ज्वाला

काली घटा से आच्छादित सुबह

रात के अन्धियारे को भगा न सकी|

वो अविष्मर्णीय रात्रि ,

स्वप्न थी  या हकिक़त,

जँहा फुल भी थे, कांटे भी,

खुशियाँ भी, आँसु भी,

सब था, पर मन की अंतर्ज्वाला को,

शीतल चन्द्र-प्रभा भी शान्त कर न सकी |

 

दिन, महीनों-सालों से लग रहे,

हर-पल अतिशय भारी,

राका मंडल मानो जम से गए,

समय हो रहा अति गतिहीन,

रात्री के इन सन्नाटों को ,

भोर की अरुणिमा भी दूर कर न सकी |

 

ऊज्वल प्रभा के गालों पर ,

ये तिव्र  तिमिर नख-प्रहार,

आशाओं एवं इच्छाओं का स्वप्न ,

 

 

 

 

ज्यूँ दुग्ध ऱज-कण पर शोषित ,

उम्मीदों के बंधन-मुक्त सपनों को,

पवन आकाश गंगा भी पार लगा न सकी |

 

जुगनू चमक चमक रहे अमावस्या में,

तारे टूट-टूट बिखर रहे ,

टूटे तारों से निकल रही विकट चिंगारी,

वर्तमान में शोला सी उठ रही चिंगारी,

शोलों के इस परिवर्तन को ,

स्मृति में  भी रोके-रोक न सकी ||

 

काली घटा से आच्छादित सुबह

रात के अन्धियारे को भगा न सकी|